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मेरा नाम मेकर

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सी पी रविकुमार 

टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स 

जैसे मंगेशकर और तेंदूलकर का नाम हम बड़े गर्व और गौरव से लेते हैं, उसी प्रकार एक और "कर" हैं जो हमारे गौरव के भाजनीय हैं - "मेकर"!

मेकर वो हैं जो अपने हाथ से कुछ बनाते हैं। और चूंकि  हाथ को "कर" भी कहते हैं, "मेकर" वो है जो अपने हाथ से कुछ मेक करे। इस डेफिनिशन को लगाया जाये तो सभी रसोइये भी मेकर हैं। आखिर समोसे और जलेबी बनाना भी एक कला है!

लेकिन हम बात कर रहें हैं उन मेकर्स की, जो कुछ इंजीनियरिंग साधन तैयार करते हैं। ऐसे मेकर्स जब एक जगह एकत्रित हो जाते हैं तो क्या क्या मेक काम कर डालें, क्या पता!

अहमदाबाद (गुजरात) में  हाल ही में एक "मेकर्स फेस्ट" का आयोजन किया गया जहां हमारे कुछ मित्र जा पहुंचे।  निधी शर्मा, रोहित गुप्ता, ईशान परदेसी, सरल अगरवाल, रितिका मालिक, नेतल यादव, और प्रियांशी जैन - ये सारे एन.एस.आई.टी और डी.टी.यू. के विद्यार्थी हैं जो मेकर्स फेस्ट में भाग लेने दिल्ली से चल पड़े।

इन विद्यार्थियों ने मेकर्स फेस्ट में कार्यागार चला कर छोटे बच्चों से ले कर बुजुर्गों तक दर्शकों का दिल जीत लिया। ये कार्यागार थे -

  1. बिना बैटरी का पांसा 
  2. बिना बैटरी का रिमोट कंट्रोलर 
  3. डूडल करने के लिये एल.ई.डी. कलम 
  4. आंखों के लिये एक इलेक्ट्रानिक लेंस 
  5. एक ध्रुव का मोटर 

इन विद्यार्थियों के मार्गदर्शक हैं प्रो। धनंजय गद्रे, जिनसे मेरे ब्लॉग के पाठक परिचित हैं। हाल ही में मैंने एन.एस.आई.टी. में आयोजित कार्यागार  के बारे में लिखा था, जिसके सूत्रधार प्रो। गद्रे ही थे। उनके निर्देशन में बना इलेक्ट्रानिक दिया टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स इनोवेशन कान्फरेंस में प्रयोग किया गया।  टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स   सेंटर आफ एम्बेडेड प्रॉडक्ट डिज़ाइन ने पिछले गर्मियों के महीनों में एक कार्यागार का आयोजन किया जिसके बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं। 

मेकर्स फेस्ट के सभी कार्यागारों की विशिष्टता यह थी कि जो भी भाग लेने आया उसने अपने हाथ से कुछ बना कर मेकर की उपाधि पाई! "लोगों को यह बहुत अच्छा लगा कि अपने हाथ से उन्होंने कुछ किया और कुछ चला कर दिखाया," नेतल यादव ने कहा। "हमारे कार्यागारों में पाठशाला के विद्यार्थियों से लेकर कालेज के अध्यापक और इंजीनियर्स भी थे।" कार्यागार में लिये गये चित्रों को आप यहाँ देख सकते हैं। 

डूडल कलम (जिसके बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं) और बैटरी के बिना चलने वाले साधनों ने लोगों को चौंका दिया। टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स के मैक्रो कंट्रोलर MSP430 पर बने इन साधनों की विशिष्टता है कि वे बहुत कम बिजली का इस्तेमाल करते हैं - इतना कम कि सूपर कपासीटर के हिलाने से जो ऊर्जा पैदा होती है, उसी से अपना काम चला लेते हैं।

मेरा ख़याल है कि ऐसे तंत्रज्ञान का प्रदर्शन हमारी पाठशालाओं में होनी चाहिये। कुछ ही साल पहले मैं एक विज्ञान मेला में गया जिसे एक पाठशाला ने आयोजित किया था। बच्चे बहुत बुद्धिमान थे, लेकिन उनके प्रोजेक्ट बहुत प्राचीन थे - जैसे (१) भावचित्रों के द्वारा मनुष्य के पाचन क्रिया को समझाओ, (२) माडेल के ज़रिये सोलार हीटर के बारे में समझाओ, इत्यादि।  बेचारे पाठशाला के अध्यापकों को नये तंत्रज्ञान के बारे में बतायेगा कौन?

प्रो। गद्रे और उनके विद्यार्थी इतने उत्सुक हैं कि वे शायद मदद करने के लिये तैयार भी हों! लेकिन एक व्यवस्था की ज़रुरत है जिसके ज़रिये इंजीनियरिंग विद्यार्थी जो कुछ नया करने में और पढ़ाने में रुचि रखते हैं, उन्हें कुछ अवसर मिले, और कुछ ऐसी नौकरियां भी हों जहां इन प्रकार के नवीन तंत्रज्ञान को लोगों तक ले जाने का काम हो।  आप का क्या ख़याल है?

हाँ, अगर आप अपने कैम्पस में कुछ कार्यागार करवाना चाहते हैं तो प्रो। गद्रे को लिख सकते हैं। 

 


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